पक्षियों और पुष्पों को निगल रहा है मोबाइल !
इन दिनों मैं हिमाचल प्रदेश की यात्रा पर हूं और कुछ दिनों से चम्बा में डेरा डाले हुए हूं। दिन में आस पास के स्थानों पर घूमने चला जाता हूं। यहां के लोग सुंदर चेहरे और स्वस्थ कद काठी वाले हैं। जितने परिश्रमी हैं, उतने ही विनम्र भी। मेरा कार चालक तीस साल का एक पहाड़ी नौजवान है। वह मुझे पहाड़ी जीवन के बारे में बहुत सी बातें बताता चलता है। आज उसके मुंह से ऐसा कुछ सुनने को मिला जिससे मेरी आत्मा कांप उठी। मुझे लगा कि यह बात थार के मरुस्थल वासियों तक भी पहुंचनी चाहिये। इस लिये यह डिस्पैच चम्बा से ही लिख रहा हूं।
हुआ यूं कि जब आज दोपहरी में मेरी गाड़ी चम्बा की गहरी घाटियों में उतरती जा रही थी और काली सर्पिलाकार पतली सड़क, पहाड़ों के बीच सरकती हुई किसी सुस्त नागिन जैसी उंघती हुई प्रतीत हो रही थी, अचानक मेरी पत्नी ने कहा कि यहां जितने पेड़ हैं उनके अनुपात में फूल नहीं हैं। पहले तो पहाड़ी घाटियां फूलों से भरी हुई दिखाई देती थीं। मैंने ध्यान दिया कि बात सही है।
पत्नी ने थोड़ी देर बाद कहा कि यहां जितने पेड़ हैं, उनके हिसाब से पक्षी नहीं हैं। मैंने फिर अपने चारों तरफ विस्तृत सघन वन प्रांतर पर दृष्टि घुमाई, बात यह भी सही थी। चारों ओर सघन हरियाली पसरी थी और पक्षियों की चहचहाट के स्थान पर गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। इससे पहले कि मुझे कुछ सूझ पाता, मेरी कार का नौजवान चालक जितेंद्र बोला, यह मोबाइल बहुत बुरी चीज है जी ! इस बार मैं बुरी तरह चौंका ! क्या मतलब ? मैंने पूछा।
जितेन्द्र ने जवाब दिया मोबाइल फोन की तरंगें जब इन जंगलों से होकर गुजरती हैं, तो इन पक्षियों को बहुत चोट पहुंचाती हैं। जिस तरह के हमारे कान होते हैं, उससे कई गुना तेज कान इन पक्षियों के होते हैं। जो आवाज हमें बहुत साधारण सुनाई देती है, वह आवाज इन पक्षियों को बहुत चोट पहुंचाती है। जब से इन घाटियों में मोबाइल फोन आया है, घाटियों में पक्षियों की संख्या बहुत कम हो गई है। मैं तो जब भी मोबाइल फोन करता हूं, तब यह मन में अवश्य आता है कि मेरी इस कॉल की तरंगों ने अपने मार्ग में आने वाले जाने कितने पक्षियों को चोट पहुंचाई होगी ! मेरे दादा कहते थे कि यह जंगल इन पक्षियों के बल पर ही जीवित है, जिस दिन पक्षी यहां से चले जायेंगे, ये जंगल भी समाप्त हो जायेंगे, जितेन्द्र ने अपनी कार को तीव्र मोड़ पर संतुलित करते हुए कहा।
उस नौजवान की बात सुनकर मेरी आत्मा कांप उठी। जितेन्द्र की बातों में दम लग रहा था। पक्षी ही तो जंगलों में पुष्पों का परागण करते हैं जिनसे घाटियां फलती फूलती है। आज पक्षी गायब हो रहे हैं, पेड़ों से पुष्प गायब हो रहे हैं, कल ये जंगल गायब हो जायेंगे। उसके बाद गायब होने के लिये केवल आदमी ही तो बचेगा ! उस नौजवान का यह संदेश मैं थार वासियों को चम्बा की घनी वादियों से भेज रहा हूं कि अगली बार जब मोबाइल फोन करें तो सोचें कि उस कॉल से थार के कितने पक्षियों को चोट पहुंचेगी!
डॉ. मोहनलाल गुप्ता
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